स्टेट डेस्क – दिल्ली हाई कोर्ट के एक माननीय न्यायमूर्ति के आवासीय परिसर में जिस तरह से करेंसी नोटों का वीडियो आग में जलते हुए पूरे देश में देखा गया वह लोगों के मानस को भीतर तक झकझोरने वाला था। शायद यह प्रकृति का न्याय था कि उन नोटों तक जहां कोई जांच एजेंसी भी कभी नहीं पहुंचती फायर ब्रिगेड का अमला पहुंच गया आग लगने की घटना के बाद और करोड़ों रूपये के करेंसी नोट की जलने की बात सामने आ गयी। बहुत से सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं जैसे कि क्या करेंसी नोट का मूल्य 15 करोड़ था या 50 करोड़ या उससे भी कम या ज्यादा? जो जलते हुए करेंसी नोट अधजले बचे थे और जो नहीं जले वो नोट अब कहां हैं। चूंकि न्यायमूर्ति महोदय का कहना है कि वे नोट उनके नहीं हैं तो क्या जांच के लिए सीसीटीवी का फुटेज मौजूद है?
पूरे देश से आवाज आ रही है कि इस मामले में तुरंत पुलिस थाने में एफआईआर क्यों नहीं किया गया? चूंकि न्यायमूर्ति महोदय का कहना था कि वे नोट उनके नहीं हैं और उन्होंने यह भी सवाल किया कि क्या कोई भी इतने नोट एक स्टोररूम में रखेगा जहां कोई भी आ जा सकता हो, तो ऐसे में तो उनको स्वयं आगे बढ़कर पुलिस थाने में एफआईआर करना चाहिए था कि वह नोट उनको फंसाने के लिए किसने उनके आवासीय परिसर में रखा। उनको हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से स्वयं जांच की मांग करनी चाहिए थी। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

सवाल यह है कि अगर कोई सामान्य व्यक्ति या किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के आवासीय परिसर में इस जैसी परिस्थिति में इतने नोटों के जखीरे के बारे में जानकारी मिलती तो क्या जांच एजेंसियां चुप रहतीं? न्यायमूर्ति महोदय के आवासीय परिसर में इतनी बड़ी राशि के पाए जाने की यह घटना भी आग लगने की घटना से लगभग एक सप्ताह बाद तब सामने आयी जब इन न्यायमूर्ति महोदय का तबादला दिल्ली हाई कोर्ट से वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट में किया गया और एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में एक खबर प्रकाशित की गयी।
तो क्या सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की बात सही थी जिसमें उन्होंने अपने भाषण में उल्लेख किया था कि एक व्यक्ति का दावा सही निकला जिसने कहा था कि एक फैसले के लिए एक न्यायमूर्ति को करोड़ों की रिश्वत दी गयी थी और अगले दिन वही फैसला आएगा जिसका वह उल्लेख कर रहा था? यह हूबहू हुआ भी। बिलकुल वही फैसला अगले दिन आया।

प्रशांत भूषण ने इस बात का उल्लेख भी किया कि कैसे एक माननीय न्यायमूर्ति ने लगभग हर फैसला एक बड़े उद्योगपति के पक्ष में दिया जिससे उस उद्योगपति को लगभग 40000 करोड़ रूपये का फायदा हुआ।
उन्होंने एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश के बारे में बताया जिनके द्वारा एक फैसले के बाद और उनकी सेवानिवृत्ति के बाद राज्य सभा का सदस्य बनाया गया। यह वही मुख्य न्यायाधीश महोदय थे जिनके ऊपर एक कोर्ट के कर्मचारी ने सेक्सुअल हरस्मेंट और प्रताड़ना का आरोप लगाया था। एक विशेष सुनवाई में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश महोदय ने आरोपों का खंडन किया। तब यह सवाल उठा था कि क्या तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश महोदय ने अपने पद और अधिकार का दुरूपयोग करके क्या मामले को दबा दिया?

जहां तक नोटों के आग में जलने की जो घटना है उससे हुआ ये कि जो बात दबे स्वर में हमेशा चर्चा में रही है वह अंततः खुलकर सामने आ गयी। आम जनता के बीच न्यायालयों में भ्रष्टाचार विषय पर पहले भी चर्चा होती रही है पर यह मुख्यतः निचली न्यायपालिका को लेकर होती रही है।
अमूमन यह माना जाता रहा है कि उच्च न्यायपालिका के स्तर पर भ्रष्टाचार नगण्य है अतः अगर किसी के साथ निचली न्यायपालिका के स्तर पर भ्रष्टाचार के कारण अगर कहीं अन्याय हुआ तो उसका निराकरण उच्च न्यायपालिका के स्तर पर हो जायेगा।
पर ऐसा नहीं कि निचली न्यायपालिका के स्तर पर हर जगह भ्रष्टाचार है। दूसरा पहलु यह भी है कि निचली न्यायपालिका के फैसलों, उनकी गुणवत्ता तथा जजों के आचरण पर उच्च न्यायपालिका कि निगाहें हमेशा रहती हैं। इसलिए कई बार ऐसा हुआ है कि ऐसे जज जिनकी सत्यनिष्ठा संदिग्ध थी उनको नौकरी से हटा दिया गया। पर उच्च न्यायपालिका के स्तर पर यह दुर्लभ है कि भ्रष्टाचार को कारण बताते हुए किसी न्यायमूर्ति को हटाया गया हो।
एक तरह से निचली न्यायपालिका के स्तर पर किसी जज को उनके खराब आचरण के कारण नौकरी से हटाना अपेक्षाकृत जितना आसान है उतना ही कठिन है उच्च न्यायपालिका के स्तर पर किसी न्यायमूर्ति को उनके आचरण के आधार पर न्यायिक सेवा से बाहर कर देना। कारण उच्च न्यायपालिका के स्तर पर न्यायमूर्तियों को संविधान द्वारा प्रदत्त असीमित विशेषाधिकार। उच्च न्यायपालिका के किसी भी न्यायमूर्ति को सिर्फ संसद में महाभियोग के जरिये ही पदच्युत किया जा सकता है।
ऐसा सिर्फ 4 बार हुआ है जब संसद में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया या इसके बारे में कार्यवाही शुरू की गयी पर आज तक स्वतंत्र भारत के इतिहास में कभी भी किसी भी न्यायमूर्ति को महाभियोग के माध्यम से हटाया नहीं जा सका है। तो क्या यह सही समय नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट अपने मॉनिटरिंग और विजिलेंस की व्यवस्था को और उच्च स्तर पर ले जाए तथा उच्च न्यायपालिका को भी लोकपाल या अन्य किसी प्रभावी व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए जिससे न्यायपालिका में लोगों का विश्वास बना रहे।
लेखक:- रंजन श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार (मध्य प्रदेश)








