स्टेट डेस्क /छिंदवाड़ा – कहते हैं कि समय पर मिला सही इलाज किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है। ऐसा ही एक भावुक और प्रेरणादायक मामला सामने आया है, जहाँ समय रहते इलाज मिलने से दो नवजात जुड़वा शिशुओं की आंखों की रोशनी बचाई जा सकी। छिंदवाड़ा निवासी राज और रानी के घर 27 दिन पहले जुड़वा बच्चों, एक बेटे और एक बेटी का जन्म हुआ। दोनों बच्चों का जन्म केवल सात महीने में हो गया, इस कारण वे अत्यंत कमजोर और गंभीर स्थिति में थे। जन्म के तुरंत बाद शिशुओं को छिंदवाड़ा के जिला अस्पताल की एनआईसीयू में भर्ती किया गया।
बेटे का वजन मात्र एक किलो 200 ग्राम और बेटी का वजन एक किलो 300 ग्राम था। समय से पहले जन्म लेने और कम वजन होने के कारण दोनों बच्चों में “रैेटिनोपैथी ऑफ प्री-मैच्युरिटी (आरओपी) नामक गंभीर आंखों की बीमारी के लक्षण पाए गए। यह बीमारी समय पर इलाज न मिलने पर बच्चों को हमेशा के लिए अंधत्व की ओर धकेल सकती है। बच्चों के माता-पिता आर्थिक रूप से बेहद कमजोर थे। अपने बच्चों की गंभीर स्थिति को देखकर वे पूरी तरह चिंतित और निराश थे। महंगे इलाज की चिंता के कारण उन्होंने उम्मीद लगभग खो दी थी।
ऐसे कठिन समय में सेवा सदन आई हॉस्पिटल ने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए दोनों बच्चों का निःशुल्क उपचार किया, जिससे परिवार को बड़ी राहत मिली। जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तुरंत बच्चों को भोपाल के सेवा सदन आई हॉस्पिटल रेफर किया। खास बात यह रही कि अस्पताल प्रशासन ने अपनी निजी वाहन व्यवस्था से दोनों शिशुओं को सुरक्षित भोपाल भेजा।
डॉक्टरों ने बताया कि आंखों से जुड़े गंभीर एवं जटिल मामलों में वे लगातार सेवा सदन आई हॉस्पिटल को मरीज रेफर करते रहे हैं। उन्हें सेवा सदन में हमेशा समय पर विशेषज्ञ चिकित्सा सहयोग एवं बेहतर उपचार प्राप्त हुआ है। अस्पताल की वरिष्ठ रेटिना विशेषज्ञ डॉ. सोनल पालीवाल, जो पिछले 6 वर्षों से आरओपी पर कार्य कर रही हैं, ने दोनों बच्चों की विस्तृत जांच की। जांच में पाया कि दोनों बच्चों को तुरंत ।Anti-VEGF इंजेक्शन की आवश्यकता है। यह इंजेक्शन आंखों में बनने वाली असामान्य रक्त वाहिकाओं की वृद्धि को रोकता है और बच्चों को रेटिना डैमेज, ब्लीडिंग तथा स्थायी अंधेपन से बचाता है। समय पर उपचार मिलने से अब दोनों बच्चों की स्थिति बेहतर है और माता-पिता ने सेवा सदन आई हॉस्पिटल एवं डॉक्टरों की टीम का आभार व्यक्त किया।
अस्पताल की रेटिना विशेषज्ञ ने कहा कि 34 सप्ताह से कम अवधि में जन्मे तथा 2000 ग्राम से कम वजन वाले बच्चों की आंखों की जांच जन्म के 20 से 30 दिनों के भीतर अवश्य करानी चाहिए। जागरूकता ही बच्चों की आंखों की रोशनी बचाने का सबसे बड़ा माध्यम है। अस्पताल ने यह भी बताया कि इस मिशन में गायनेकोलॉजिस्ट, पीडियाट्रिशियन और एनआईसीयू् टीम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके सहयोग से ही ऐसे बच्चों की समय पर पहचान और उपचार संभव हो पाता है। सेवा सदन का यह प्रयास न केवल एक सफल इलाज की कहानी है, बल्कि समाज को जागरूक करने वाला एक संदेश भी है- “हर प्री-मैच्योर बच्चे की आंखों की जांच जरूरी है, क्योंकि समय पर इलाज से शिशुओं के आजीवन अंधेपन को रोका जा सकता है।”
KBP NEWS.IN
…जाहिद खान
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